जगदीश यादव
कोलकाता। राज्य के तमाम लोगों की तरह राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निर्देश पर विध्नहर्ता गणेशजी की पूजा का आयोजन किया गया। सबसे खाश बात तो यह रही कि उक्त धार्मिक कर्मकांड को शोभनदेव चटर्जी ने एक पुरोहित के तौर सम्मपन्न कराया। सिद्धीदाता के अराधना के आयोजन सीएम के घर पर नहीं किया गया था बल्कि उक्त आयोजन तृणमूल भवन में किया गया। वैसे दीदी के द्वारा गणेश पूजन को लेकर राजनीति के गलियारों में तमाम तरह की चर्चाओं का दौर गरम हो गया है। ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो यह मान रहें है कि दीदी तमाम परेशानियों से घिरी हुई हैं इसलिये विध्नहर्ता की अराधना करना पड़ा है। जबकि तृणमूल सूत्रों का कहना है कि बंगाल में कोई भी अक्षय तृतीया पर गणेशजी की पूजा करता है। बंगाल में घटिया राजनीति का दौर भी शुरु हो गया है । धार्मिक कर्मकांड में भी मतलब तलाशना अवसरवादी मानसिकता है।
बहरहाच चाहे जो भी लेकिन राज्य में बिधानसभा के चुनाव हो गये व 19 मई को मतगणना है। राज्य के एक धड़े को राज्य में कथित परिवर्तन की गंध मिल रही है। हुए चुनाव को लगभग साफ सुथरा माना जा रहा है । पांच साल पहले सत्ता से बाहर होने के बाद एक बार फिर से वामदलों ने अपना पूरा जोर लगा दिया है, यहां तक कि कांग्रेस से समझौता करना भी उनके लिए कोई परेशानी का सबब नहीं बना। इसलिए इस राज्य के चुनावी नतीजों का इंतजार शायद सबको है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का प्रभाव। तमाम आरोपों और टकराव के बीच कामयाबी से अपना करीब एक कार्यकाल पूरा कर चुकी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस अपने दूसरे कार्यकाल को लेकर काफी आश्वस्त दिखाई दे रही है। हालांकि चुनाव के ऐन मौके पर कोलकाता में एक फ्लाईओवर के गिरने की घटना और तृणमूल कांग्रेस के चार बड़े नेताओं के स्टिंग ऑपरेशन में पकड़े जाने के कारण पार्टी को स्थानीय स्तर पर थोड़ा धक्का तो लगा है। तृणमूल की ओर से इसका जबर्दस्त खंडन किया जा रहा है और प्रतिक्रिया भी दी जा रही है। लेकिन सच यह भी है कि मुद्दों के मारे विपक्ष को इसने उंगली उठाने का कारण तो दे ही दिया है। अब चुनावों में इसका असर कितना होगा, यह देखने की बात है। सच यह है कि बंगाल में पिछले विधानसभा चुनाव में जो बुद्धिजीवी ममता के समर्थन में थे, उनमें से ज्यादातर लोग आज उनसे दूर हो चुके हैं। दीदी के लोग भले ही गणेश पूजा पर कुछ भी कहें । अब देखना है कि विध्नहर्ता श्री गणेश की कृपा से दीदी की हाथों में सत्ता की बागडोर फिर से मिलती है कि नहीं ।

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