dipak das

लेखक प्रख्यात ज्योतिषी व भविष्यवक्ता हैं।

दीपक कुमार दासगुप्ता

देश में इन दिनों कालेधन पर छिड़ा विवाद सुर्खियों में है। पक्ष – विपक्ष दोनों खेमे से तर्क पेश किए जा रहे हैं। लेकिन देश हित में हमें यह सोचना पड़ेगा कि क्या इस विवाद की कोई रचनात्मक परिणति होनी है या हम इस पर व्यर्थ की चिल्लपों ही मचाते रहेंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि धन सफेद या काला नहीं हो सकता है। धन सिर्फ धन है, जिसका उपयोग आदमी अपने लिए करता है। कुछ धन छिपा कर रखा जाता है ताकि आपत्ति – विपत्ति में इसका इस्तेमाल किया जा सके। एक गृहिणी द्वारा पाई – पाई जुटा कर रखी गई रकम को भी क्या काला धन कहा जाएगा। मेरे एक परिचित रेलवे कर्मचारी की पत्नी को जब पता चला कि सरकार ने नोटबंदी कर दी है तो वो परेशान हो उठी। क्योंकि उसने परिवार वालों से छिपा कर इन बड़े नोटों से तकरीबन पौने दो लाख रुपए की बचत कर ली थी। क्या इसे काला धन कहा जाएगा।  अब बात टैक्स चोरी या काफी अधिक राशि जमा करने की है तो इसके लिए पुलिस और कर विभाग को ही इतने अधिकार प्राप्त है कि वे इस पर लगाम लगा पाने में पूरी तरह से सक्षम है। यह राजनीति ही है जो इन विभागों को पंगु बना रखे हुए हैं। आखिर देश में कितने राज्य व शहर हैं जहां कर विभाग के कर्मचारियों को ईमानदारी से कार्य करते देखा जाता है। ज्यादातर बस खानापूर्ति ही होती है। कुछ मामलों में देखा जाता है कि बड़े लोगों पर हाथ डालने के लिए विभागीय अधिकारियों को अपने वरिष्ठों का मुखापेक्षी बनना पड़ता है। यदि हम पुलिस और टैक्स विभाग को जवाबदेह बनाएं और स्वतंत्र तरीके से कार्य करने दें तो मेरा मानना है कि हमें करेंसी बदलने या किसी नोट को बंद करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। जैसा आज हो रहा है । देश की जनता को बेहद परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। शेयर से लेकर बाजारों में मंदी है। हम एक बार भी नहीं सोचते कि काला धन – काला धन का शोर मचा कर दुनिया में देश की प्रतिष्ठा को भी धूमिल करने का कार्य कर रहे हैं। डॉक्टरी से लेकर कुछ पेशे ऐसे हैं जिसमें बहुत अधिक कमाई है। आय के इन स्त्रोतों को कुंद करने के बजाय क्या हम यह नहीं कर सकते कि अतिरिक्त आय का सदुपयोग कमाने वाले के साथ देश हित में भी हो। इस रकम को जीवन बीमा जैसे निगमों में निवेश भी तो कराया जा सकता है जिससे बीमा कराने वाले के साथ देश का भी लाभ होगा। आखिर पेशों की कुछ अभिप्रेरक शक्तियां भी होती है। यदि अभिप्रेरणा नहीं होगी तो कार्य की गुणवत्ता की उम्मीद हम नहीं कर सकते हैं।  अब बात छोटे या बड़े नोटों की तो मेरा मानना है कि व्यापक हित में दोनों तरह के नोट होने चाहिए। पांच हजार से बीस हजार तक के नोट होने से एक ओर जहां बड़े कारोबारियों को सुविधा होगी । बैंक के लॉकरों में कम जगह की जरूरत होगी, वहीं 300 से लेकर 700 और 1500 रुपए के भी नोट होने से आम जनता खास कर छोटे व्यापारियों को सुविधा होगी। इसलिए सरकार को इस तरह के नोट जारी करने चाहिए। नोटबंदी के बजाय सरकार को चाहिए कि इसके लिए जवाबदेह विभागों का गठन कर उन्हें प्रभावी निगरानी का दायित्व सौंपा जाए। जिससे देश की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। केवल काला धन का शोर मचा कर हम कुछ भी हासिल नहीं कर सकते हैं। इससे बस समय और ऊर्जा की बर्बादी ही होगी। आज काफी लोग ऐसे हैं जो काला धन के सवाल पर बगैर कुछ जाने – समझें दलीलें दे रहे हैं। लेकिन यह सवाल इतना आसान नहीं है। यह हर किसी को

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