यह साल अब अपने तय उम्र के ढलान पर है। अगर इस साल इस देश के तमाम उपलब्धियां मिली तो ऐसे भी तमाम विवाद हुए जिसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी उसे खूब तवज्जो दी। दस बड़े विवाद जो इस साल इस काफी सुर्खियों में रहे। साल 2017 अब जाने को तैयार है और नए साल की आगाज होने वाली है। इन विवादों के चलते ना सिर्फ हंगामा हुआ और जानमाल की क्षति हुई बल्कि कई दिनों तक देश हिंसा की आग में झुलसता रहा।

तीन तलाक विवाद
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केन्द्र सरकार की तरफ से तीन तलाक को खत्म करने के बारे में दिए गए संकेत के बाद से लगातार देशभर में इस पर जोर-शोर से चर्चाएं होने लगी। मुस्लिम महिलाओं ने इसका जोरदार समर्थन किया। हालांकि, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस कानून में किसी तरह का छेड़छाड़ ना करने की हिदायत दी।शायरा बानो ने तीन तलाक के खिलाफ कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की थी। इस पर शायरा का तर्क था कि तीन तलाक न तो इस्लाम का हिस्सा है और न ही आस्था। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने बहुमत के निर्णय में मुस्लिम समाज में एक बार में तीन बार तलाक देने की प्रथा को निरस्त करते हुए अपनी व्यवस्था में इसे असंवैधानिक, गैरकानूनी और शून्य करार दिया। कोर्ट ने कहा कि तीन तलाक की यह प्रथा कुरान के मूल सिद्धांत के खिलाफ है। प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अपने 365 पेज के फैसले में कहा, ‘3:2 के बहुमत से दर्ज की गई अलग-अलग राय के मद्देनजर‘तलाक-ए-बिद्दत’’ तीन तलाक को निरस्त किया जाता है।

अयोध्या विवाद
इस साल अचानक अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद उस वक्त सुर्खियों में आ गया जब 11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों पर 5 दिसंबर में नियमित सुनवाई करने की बातें कही। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से ठीक पहले आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक और आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविंशकर अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद पर मध्यस्थता की कोशिश करने के लिए श्री श्री रविशंकर अयोध्या पहुंच गए। श्री श्री की इस कोशिश के बीच संत समाज में घमासान मचा गया। जबकि, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने श्री श्री की मध्यस्थता की कोशिश पर कहा कि अब बातचीत में देर हो चुकी है।अब, अयोध्या मामले की नियमित सुनवाई आखिरकार 8 फरवरी, 2018 से नियमित रूप से होगी। सुनवाई को 2019 के आम चुनाव पूरे होने तक टालने की सुन्नी वक्फ बोर्ड की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया। पांच दिसंबर को सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पेश हुए वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि यह मामला बेहद संवेदनशील है और इस मामले में फैसला देश की राजनीति पर गहरा असर डालेगा। जिसके बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए इस मुद्दे पर राहुल गांधी से इसका जवाब मांगा था।

दार्जिलिंग विवाद
इस महीने जून की गर्मी के बीच अचानक गोरखालैंड की धरती हिंसा की सुलगने लगी और देखते ही देखते इसकी लौ और तेज़ होती गई। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा समर्थकों और सुरक्षाबलों में टकराव के बाद सैकड़ों लोग घायल हुए। स्थिति ऐसी बेकाबू हुई कि राज्य की ममता सरकार को केन्द्र को स्थिति संभालने के लिए सेना की मांग करनी पड़ी। कई दिनों तक गोरखालैंड की सड़कों पर सेना की मार्च के बाद जाकर स्थिति संभली। हालांकि, तब तक कई लोगों की इस प्रदर्शन के दौरान जानें जा चुकी थी और पर्यटन का पर असर के चलते करोड़ों का नुकसान हो चुका था। दरअसल, ये पूरा विवाद अचानक उस वक्त शुरू हुआ जब पश्चिम बंगाल सरकार ने एक अधिसूचना जारी की। इसमें कहा गया कि राज्य के सारे स्कूलों में बांग्ला भाषा पढ़ाना अनिवार्य किया गया है। इसके बाद गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने दार्जिलिंग और कलिम्पोंग जिलों में विरोध प्रदर्शन किए और खूब हिंसा का तांडव चला। हालांकि, ममता बनर्जी ने बाद में साफ कर दिया कि पहाड़ी क्षेत्रों के लिए ये आदेश अनिवार्य नहीं है बल्कि चुनने की आजादी है। उसके बावजूद गोरखा जनमुक्ति के नेता इसके लिए तैयार नहीं थे और अलग राज्य की मांग एक बार फिर से जोड़ पकड़ लिया।

रोहिंग्या विवाद
साल 2017 में जो विवाद सामने आया उनमें से एक बड़ा विवाद था रोहिंग्या का। यह भले ही म्यांमार का मसला रहा हो लेकिन इसकी गूंज भारत तक सुनाई दे रही है थी और वहां से भगाए जा रहे रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण देने की मांग की जा रही थी। हालांकि, भारत सरकार ने देश के लिए सुरक्षा बताते हुए इन रोहिंग्या मुसलमानों को यहां आने से रोक दिया। लेकिन, बाद में यह पता चला कि पहले से ही भारत में करीब 40 हजार से ज्यादा रोहिंग्या भारत में शरण ले चुके हैं। खुफिया एजेंसी को यह भी पता चला कि इन रोहिंग्या मुसलमानों के पाकिस्तान का आतंकी तत्वों से सीधा कनेक्शन है।दरअसल, ये विवाद उस वक्त शुरु हुआ जब म्यांमार में 25 अगस्त को वहां के सुरक्षाबलों पर रोहिंगिया कट्टरपंथियों की तरफ से हमले किए गए। जिसके बाद सुरक्षाबलों की तरफ से जवाबी कार्रवाई की गई। इसके चलते लाखों की तादाद में रोहिंग्या मुसलमानों ने बांग्लादेश और अन्य देशों की ओर रुख किया। भारत में भी अलग अलग संगठनों की तरफ से इन रोहिंग्याओं को शरण देने की मांग उठी और पहले से आ चुके रोहिंग्याओं को न निकालने को लेकर आवाज़ उठी।

पद्मावती विवाद
पद्मावती को लेकर ना सिर्फ देशभर में बवाल हुआ और फिल्म में अभिनय करनेवाले दीपिका पादुकोण की नाक काटने की धमकी दी गई बल्कि मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार समेत कई राज्य ने अपने यहां इसके रिलीज पर रोक लगा दी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने फिल्म निर्माता से इस मुद्दे पर प्रोड्यूसर से स्पष्टीकरण देने को कहा। नतीजा ये रहा कि फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली को दिसंबर में प्रस्तावित फिल्म रिलीज की तारीख टालनी पड़ी।दरअसल, राजपूत समुदाय का कहना है कि फिल्म पद्मावती में पद्मावती को गलत ढंग से पेश किया गया है। इससे पद्मावती का अपमान हो रहा है। रानी पद्मावती के एतिहासिक तथ्यों से खिलवाड़ किया गया है वहीँ भंसाली का कहना है की इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नही है। राजस्थान में शूटिंग के दौरान ही ये फिल्म विवादों में आ गयी थी उस वक्त करणी सेना ने शूटिंग के सेट पर जाकर खूब तोड़फोड़ की थी जिसके बाद संजय लीला भंसाली ने फिल्म पूरी होने के बाद राजपूत समुदाय को दिखाने के बाद ही रिलीज करने की बात कही थी। जिसके बाद से अब इस फिल्म को लेकर विवाद चल रहा है।

डोकलाम विवाद
पिछले कई दशकों में ऐसा पहली बार हुए जब एशिया की दो बड़ी शक्ति आमने-सामने आने के बाद युद्ध के मुहाने से वापस लौट आयी और इस तरह एक बड़ी तबाही होने से बच गया। भारत-चीन और सिक्किम बॉर्डर से लगते डोकलाम क्षेत्र को भूटान और चीन दोनों ही अपना हिस्सा मानता है। इस पर विवाद उस वक्त शुरु हुआ जब चीनी सैनिकों की तरफ से किए जा रहे सड़क निर्माण कार्य को जून में भारतीय सेना के जवानों ने रोक दिया। चीन ने इसे अपनी सीमा में भारत का अतिक्रमण करार दिया। चीन की सरकारी मीडिया इसके लिए भारत की भारी कीमत युद्ध के रुप में चुकाने की धमकी दी। जबकि, चीन की सरकार की तरफ से 1962 के युद्ध में हार की याद दिलाई गई। हालांकि, तत्काल रक्षामंत्री का पदभार संभाल रहे वित्तमंत्री अरुण जेटली ने भी चीन की धमकी का मुंहतोड़ जवाब दिया और उससे कहा कि कोई अब भारत को अब हलके में ना लें क्योंकि अब ये पहले का भारत नहीं है।करीब सत्तर दिनों तक डोकलाम चल गतिरोध के बाद चीन और भारत दोनों ने ही अपनी सेना के जवानों को वहां से शांतिपूर्वक वापस बुलाने का फैसला किया। इसके बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चीन के शिनजियांग शहर में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया और सम्मेलन से इतर चीन के राष्ट्रपति से मुलाकात कर दोस्ती को नए संबंध पर ले जाने की बात कही।

 टेरर फंडिंग विवाद
अलगाववादियों पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की तरफ से कार्रवाई के दौरान जो खुलासा हुआ वह चौंकानेवाला था। एनआईएक के इस दावे ने पूरे देश को सन्न कर दिया जब ये पता चला कि जम्मू कश्मीर में अलगववादी नेताओं की फंडिंग हवाला के जरिए हो रही है और वह घाटी में लगातार हिंसा और आतंकी गतिविधियों को हवा देने के लिए इन पैसों का इस्तेमाल कर रहे हैं। एनआईए की तरफ से किए गए इस खुलासे के बाद तमाम जांच एजेंसियां इन अलगाववादियों के खिलाफ सक्रिय हुई। जांच एजेंसी ने कश्मीरी अलगाववादियों से जुड़े लोगों के दिल्ली से लकर श्रीनगर तक कई ठिकानों पर छापेमारी की और भारी मात्रा में नकदी जब्त की और कई अलगावववादी नेताओं को गिरफ्तार किया गया।

बीएचयू विवाद
इस साल सितंबर के महीने में जहां पूरा देश देव शक्ति की अराधना और नवरात्रि की पूजा में जुटा हुआ था तो वहीं दूसरी तरफ बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में छात्राओं का गुस्सा उबाल पर था। उसकी वजह थी बीएचयू कैंपस में यूनिवर्सिटी की छात्रा से छेड़खानी के बाद आरोपी पर कार्रवाई के लिए प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए प्रदर्शन पर बैठना। जिसके बाद छात्राओं पर पुलिस की तरफ से किए गए लाठी चार्ज ने ऐसा तूल पकड़ा कि प्रदर्शन पूरी तरह से उग्र हो गया। जिसके बाद कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया और छात्रों के बेकाबू होते प्रदर्शन के बीच पूरे मामले पर खुद राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को दखल देनी पड़ी। आखिरकार, लाठीचार्ज, आगजनी और बवाल के बाद सियासत भी शुरु हो गई और महिला सुरक्षा के नाम पर राज्य सरकार को भी कटघरे में खड़ा किया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के नाते भी इस मामले महिला सुरक्षा के बाहने खूब तूल दिया गया।

वसुंधरा सरकार के बिल पर विवाद
राजस्थान की वसुंधरा सरकार के उस अध्यादेश पर जमकर विवाद खड़ा हो गया जिसमें वर्तमान और पूर्व नौकरशाहों के खिलाफ मुकदमा करने करने के लिए सरकार की मंजूरी लेने और उससे पहले उससे संबंधित खबरें छापने पर सज़ा का प्रावधान करने वाले ‘दंड विधियां (राजस्थान संशोधन) अध्यादेश, 2017’ को विधानसभा में पेश किया गया। 6 सितंबर 2017 को जारी इस विवादित अध्यादेश को बिल के रुप में वसुंधरा सरकार के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने विधानसभा में रखा। उसके बाद देश भर में हंगामा मचा गया।वसुंधरा सरकार के इस कदम का विपक्षी पार्टी से लेक मीडिया संगठन एडिटर्स गिल्ड तक सभी ने कड़ी निंदा की। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने विवादित कानून का विरोध किया और कहा कि इसे ‘पत्रकारों को परेशान करने, सरकारी अधिकारियों के काले कारनामे छिपाने और भारतीय संविधान की तरफ से सुनिश्चित प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाला एक घातक कानून’ बताया। जबकि, काग्रेस ने जमकर हल्ला बोला।दरअसल राज्य की वसुंधरा राजे सरकार की कोशिश उस अध्यादेश को सदन से पास कराने की थी जिससे अब जजों, न्यायिक अधिकारियों, अफसरों और लोक सेवकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराना मुश्किल हो जाता। हालांकि, विवाद के बढ़ता देख सरकार बैकफुट पर आ गई जिसके बाद वसुंधरा सरकार ने लोकसेवकों पर बिना इजाजत मुकदमा नहीं दर्ज करने वाले विवादित बिल प्रवर समिति में भेजने के नाम पर ठंडे बस्ते में डाल दिया।

जयललिता की मौत पर विवाद
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने 5 दिसंबर 2016 को हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कर दिया लेकिन अपने छोड़ गई वो मिस्ट्री जिसका पता लगाने के लिए पूरे साल वो सुर्खियों में रहीं। 72 दिनों तक चेन्नई के अपोलो अस्पताल में फेफड़े में संक्रमण के चलते इलाज के बाद जललिलता का निधन हो गया। लेकिन, उनके निधन को उनके पार्टी के ही कई नेताओं ने एक बड़ा रहस्य करार दिया। जिसके बाद इस साल जययलिता की मौत की मिस्ट्री का पता लगाने के लिए एक सदस्यीय आयोग गठन का फैसला भी लिया गया। लेकिन, जयललिता की मौत आज भी लोगों के सामने एक मिस्ट्री बनी हुई है और रह-रहकर खूब राजनीति हो रही है। कुछ लोग इसके पीछे जयललिता की करीबी रही शशिकला का हाथ देख रहे हैं।

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