शिव रात्री पर विशेष

जगदीश यादव

bhukailash gadh mandir2अगर बात एशिया महाद्वीप में वृहतम शिव लिंगों की करें तो महानगर कोलकता के खिदिरपुर अंचल में स्थित है भूकैलाश गढ़ का नाम भी आता है। कहते हैं कि आस्था के आगे हर चीज बौना नजर आता है। ऐसे में भूकैलाश गढ़ में देवों के देव महादेव शिव का निवास है।ऐसा उनके भक्तो का मानना भी है।  कहते हैं कि यहां एकल काले पत्थरों से बना शिव लिंग है।  वृहत्तम दो शिवलिंग भूकैलाश गढ़ के दो शिवमंदिरों में स्थापित है। 227 वर्ष प्राचीन इन शिवलिंगों को श्री रक्त कमलेश्वर और श्री कृष्ण चंद्रेश्वर के नाम से जाना जाता है।1781  में निर्मित इन मंदिरों के परिसर में हर वर्ष शिवरात्रि के पावन अवसर पर एक भव्य मेले का आयोजन होता है। स्थानीय लोगों व दस्तावेजो से पता चलता है कि इन मंदिरों का निर्माण महाराज जयनारायण घोषाल ने कराया था। आज भी राजवंश के लोग इस जगह रहते हैं। bhuwnesh adv.कहा जाता है कि महाराजा जय नारायण घोषाल के पूर्वज व वाराणसी के मूल निवासी रामकृष्ण पाठक थे। वह बंगाल के गोविंदपुर में बस गए थे। रामकृष्ण पाठक के पुत्र राजेंद्र पाठक और राजेंद्र पाठक के दो पुत्र विष्णुदेव पाठक और कृष्णदेव पाठक हुए। कृष्णदेव पाठक के पुत्र कंदर्प पाठक थे जिनके नाम के साथ कालांतर में पाठक के स्थान पर जाति सूचक नाम घोषाल संयुक्त हुआ। काशी यानी वाराणसी का यह पाठक परिवार धार्मिक भवनाों से ओतप्रोत था। 1933 में प्रकाशित की गयी एक पत्रिका की माने तो भूकैलाश गढ़ के जोडा शिवमंदिरों का निर्माण करने वाले महाराजा जय नारायण घोषाल का जन्म पलाशी युद्ध के ठीक पांच वर्ष पहले 1751 में हुआ था। उन्होंने 300 बीघा जमीन में भुकैलाशागढ़ सिंहद्वार, जोड़ा शिवमंदिर सहित जलाशय शिव गंगा आदी का निर्माण कराया था। उनके पितामह कंदर्प घोषाल हावड़ा के बकसाड़ा से कोलकाता के गोविंदपुर में एक बस्ती की स्थापना की। वह तत्कालीन नवाब की नौकरी के साथ ही नमक सहित अन्य खाद्य पदार्थों का व्यापार करते थें। स्थानीय लोगों व मिली जानकारी को माने तो पलाशी युद्ध के उपरांत आज के फोर्ट विलिएम यानी अग्रेजों का नया किला बनने के दौरान कंदर्प परिवार को खिदिरपुर में जमीन मिली और वह लोग यहां चले आये।नवाब सिरजुदौला के हमले के दौरान इस शहर का काफी नुकसान हुआ था। ऐसे में मीर जाफर के नवाब होने के बाद अंग्रेजो ने उक्त नुकसान की कथित भरपाई के लिये अंग्रेजो ने जिस कमिशन की स्थापना की थी। उक्त कमिशन के सदस्य गोकूलचंद्र को बनाया गया था। कहते हैं कि घोषाल परिवार के संस्थापक कहे जाने वाले महाराजा जयनारायण घोषाल को तमाम भाषाओ की जानकारी थी। ऐसे में उन्हे नवाब नजीम मुबारकदौला के दरबार में नौकरी मिली थी।

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