कोलकाता। जनता विशेष कर ग्रामीणों के अगाध समर्थन से निहाल ममता बनर्जी के सामने विरोधी अब खामोश हैं। वैसे अगर पश्चिम बंगाल के इतिहास में झांके तो पता चलता है कि बंगाल में सत्ता की चाबी हमेशा से ही ग्राम बांग्ला के लोगों के हाथों ही रही है। वाम मोर्चा की सरकार अगर 34 वर्षों तक सत्ता में जमी रही तो उसके पीछे ग्रामीण मतदाताओं की अहम भूमिका थी। वर्ष 2016 का विधानसभा चुनाव भी अपवाद नहीं है। राज्य में वाममोर्चा सरकार अगर 34 साल तक लगातार सत्ता में रही थी तो इसकी सबसे बड़ी वजह ग्रामीण इलाकों में उसका मजबूत जनाधार होना था। लेकिन पहली ऐसा हुआ है जब किसी को यानी   ममता बनर्जी को शहरी क्षेत्रों के वोटरों का भी समर्थन मिला है।

कांग्रेस और वाम मोर्चा के गठजोड़ के बावजूद ममता ने अपने ग्रामीण वोट बैंक को बनाए रखने का प्रयास किया और इसमें उनको काफी कामयाबी भी मिली। इन वोटरों में अल्पसंख्यक तबके की भी खासी आबादी है। इस तबके ने पिछली बार तृणमूल का समर्थन किया था और अबकी भी उनके वोट तृणमूल की ही झोली में गए।

राज्य के ग्रामीण इलाकों में लोगों को शारदा चिटफंड घोटाले और तृणमूल कांग्रेस नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और कोलकाता में हुए फ्लाईओवर हादसे से कोई मतलब नहीं है। उनके लिए ममता बनर्जी सरकार की ओर से शुरू की गई सबूज साथी, खाद्य साथी और कन्याश्री व युवाश्री जैसी योजनाएं ही समर्थन का पैमाना हैं। उन्होंने चुनाव अभियान के दौरान ग्रामीण इलाकों पर खास ध्यान दिया और तमाम योजनाओं और उपलब्धियों का प्रचार करती रही हैं।

अपनी रैलियों में वह वित्तीय तंगी के बावजूद सरकार की ओर से किए गए विकास कार्यों को गिनाती रही हैं। राज्य के ग्रामीण इलाकों में तृणमूल कांग्रेस के वोटों का हिस्सा 43 फीसदी है। खासकर दक्षिण बंगाल के ग्रामीण वोटरों ने पिछले चुनावों में तृणमूल कांग्रेस का खुल कर समर्थन किया था।

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