जगदीश यादव

लेखक अभय बंग पत्रिका व www.atvabhay.com के संपादक व निदेशक हैं।

लेखक अभय बंग पत्रिका व www.atvabhay.com के संपादक व निदेशक हैं।

देश आजाद हुआ और फिर उसके बाद से भाषा, संस्कृति और प्रशासनिक जरुरतों व राजनीतिक मकसदों के तहत नये राज्यों का जन्म शुरु हुआ। ऐसे में एक और नये राज्य तेलंगाना का भी जन्म हो गया है। आज राज्यों का बंटवारा सियासत का गंदा खेल बन चुका है। लेकिन सवाल है कि हम कबतक अपनी मां (देश की धरती) के कलेजे के टुकड़े करते रहेंगे और क्यों? सवाल बड़ा है और सफेदपोशों के लिये सवाल जहरीले तीर के जैसा होगा, लेकिन सफेदपोशो को तो जैसे शर्म आती ही नहीं है। एक बार फिर अलग गोरखालैंड के नाम पर आज भी पहाड़ पर आग धधक रही है। गुरुवार को दार्जिलिंग में हुई हिंसा ने एक बार फिर इस आग को दहका दिया है। जरुरत बन पड़ी है कि अब राजनीतिक पार्टियों के लोगों को एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना बंद कर मुद्दे का समाधान तलाशने की कोशिश करनी चाहिए। पिछले 3 दशक से बंगाल के इस पहाड़ी इलाके की प्रमुख समस्याओं के समाधान की दिशा में अब ठोस कदम उठाने की जरूरत है। जानकारी खंगाले तो पता चलता है कि राजनीति में इस आरोप-प्रत्यारोप की शुरुआत 1986-88 में शुरू हुई थी जब माकपा ने एक नारा दिया था, ‘कंचनजंगाए रक्तोर दाग केनो,  राजीव गांधी जवाब दो’ जिसका अर्थ है कि कंचनजंगा के पहाड़ों पर खून के दाग क्यों हैं, राजीव गांधी जवाब दें। वह दौर थाी कि तब माकपा के नेपाली पहाड़ी काडरों ने हथियार उठाकर सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखालैंड की मांग व मुद्दे को जन्म दिया था। कहते हैं कि कथित ‘भाईमारा लड़ाई’ की उक्त जंग आन्दोंलन में  1200 से अधिक लोगों के मारे व  10 हजार से अधिक घर आग के हवाले किये गये व सैंकड़ों लोगों जेल में भेंजे गये।

वैसे जानकारों का मानना है कि चुनावों में जीत के लिए गोरखालैंड बनाम बंगाल का चुनावी नारा दिया गया । लेकिन स्थिती व समय की गंध भांप चुके गुरुंग ने अब एक बार फिर भाषा के मुद्दे को उछाल दिया है। जीजेएम की राजनीति के लिए  यह मुद्दा संजीवनी साबित हो सकता है। लेकिन ममता बनर्जी को कम आंकना बेवकुफी होगी। कारण ममता बनर्जी ने  बी सी रॉय से अलग रास्ता चुना है। भाषाई और क्षेत्रीय अस्मिता के सवालों पर उबाल मारते इस क्षेत्र को रॉय नजरअंदाज कर चुके थें।  जबकि ममता वहां अपना झंडा गाड़ना चाहती है। 2011 में गोरखालैंड टेरिटोरियल ऐडमिनिस्ट्रेशन की स्थापना के बाद बिमल गुरुंग को गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का प्रतिनिधि नियुक्त किया गया। क्षेत्रीय अस्मिता के आधार पर राज्य निर्माण के मुद्दे पर जीजेएम ने निकाय चुनावों में 4 में से 3 में अपना परचम लहराया है। जाहिर कोई भी समझ सकता है कि पहाड़ पर अपनी डफली अपना राग ही अलापा जा रहा है। वैसे पृथक विदर्भ राज्य की मांग भी हो रही है लेकिन इसे सरकार फिलहाल महत्व नहीं दे रही है।  वर्ष 1965 तक सौराष्ट्र अलग था लेकिन अब गुजरात के साथ है। रह रह कर सौराष्ट्र अलग की मांग उठ रही है। 1987 में असम से अलग बोडोलैंड राज्य के लिये बोडों आंदोलनरत है। कई वर्षो से हरित प्रदेश के नाम पर अलग राज्य के लिये आंदोलन चल रहा है। 1 मई 1960 के तत्कालीन बंबई को अलग कर गुजरात व महाराष्ट्र बना। 1 दिसम्बर 1963 को नगालैंड का जन्म हुआ। 1966 को दक्षिण पंजाब के जिलों को बांट कर हरियाणा राज्य का निर्माण किया गया। 15 जनवरी 1971 हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा व मेघालय का जन्म हुआ। 26 अप्रैल 1965 में सिक्किम का भी उदय हो गया। 20 फरवरी 19 87 को अरुणाचल व मिजोरम का भी जन्म हो गया। 1 नवम्बर 2000 को मध्यप्रदेश को बांट कर छत्तीसगढ़ व 9 नवम्बर 2000 को ही उत्तर प्रदेश को बांट कर उत्तरांचल जो कि 2007 में उत्तराखंड हो गया। 15 वनम्बर 2000 को बिहार को बांट कर झारखंड बना दिया गया। जबकि तत्कालीन यूपीए सरकार ने 30 जुलाई 2013 को आंध्रप्रदेश को बांटकर अलग तेलंगाना राज्य बन गया। वहीं कोलकाता से ही बैठकर मिथला विकास परिषद के अशोक झा पृथक मिथला राज्य की मां कर रहें हैं।

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