मेयर बनाने के खिलाफ कलकत्ता हाई कोर्ट याचिका दायर

कोलकाता। महानगर में राज्य के शहरी विकास मंत्री फिरहाद हकीम को मेयर को बनाने को लेकर राजनीति का पारा एक बार फिर गर्म हो गया है। ऐसे में फिरहाद हकिम की परेशानी बढ़ सकती है। महानग के 75 नंबर वार्ड की माकपा पार्षद बिल्किस बेगम ने कलकत्ता उच्च न्यायालय की खंडपीठ में आज इससे सम्बन्धित एक याचिका दायर की है। उक्त याचिका फिरहाद हकीम को मेयर बनाने के लिए नगर निगम के मौजूदा कानूनों में संशोधन के खिलाफ की लगाई गई है। याचिकाकर्ता ने बताया कि अस्थाई मुख्य न्यायाधीश विश्वनाथ समाद्दार की खंडपीठ में याचिका दायर की गई है। याचिका में न्यायमूर्ति देवांग्शु बसाक की एकल पीठ के 30 नवम्बर को दिए गए उस निर्देश को खारिज करने की मांग की गई है जिसमें उन्होंने कहा था कि विधानसभा में किया गया संशोधन कानून के अनुसार वैध है। फिरहाद को मेयर बनाए जाने में गैरकानूनी रास्ते नहीं अपनाए गए हैं। इस बारे में बिल्किस बेगम ने बताया कि कोलकाता नगर निगम कानून में संशोधन का अधिकार पश्चिम बंगाल सरकार के पास नहीं है। इसके लिए पूरे संविधान में बदलाव करने की जरूरत पड़ती है। राज्य सरकार ने गैर कानूनी तरीके से इस कानून में संशोधन किया और पार्षद नहीं होने के बावजूद फिरहाद हकीम को कोलकाता का मेयर बनाया है। इस कानून को रद्द किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसी सप्ताह मामले की सुनवाई होगी। इसके लिए तारीख फिलहाल तय नहीं हुई है। दरअसल माकपा की पार्षद बिल्किस बेगम ने उच्च न्यायालय में गत 27 नवम्बर को एक याचिका लगाई थी। उन्होंने दावा किया था कि राज्य सरकार ने कोलकाता नगर निगम अधिनियम 1980 में बदलाव कर यह प्रावधान जोड़ा है कि कोई भी व्यक्ति कोलकाता नगर निगम का मेयर बन सकता है। उसे छह महीने के अंदर किसी न किसी वार्ड से पार्षद का चुनाव जीतना अनिवार्य होगा। इस पर सुनवाई करते हुए 30 नवम्बर को न्यायमूर्ति देवांग्शु बसाक ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि विधानसभा ने मौजूदा कानूनों के अनुसार संशोधन किया गया है। इसमें कुछ भी गैरकानूनी नहीं है। अब इसके खिलाफ उन्होंने खंडपीठ में याचिका लगाई है। पहले यह नियम था कि कोई पार्षद ही मेयर बन सकता है। बिल्किस बेगम ने दावा किया है कि यह कानून असंवैधानिक है। नगर निगम के कानून में बदलाव के लिए राष्ट्रपति से अनुमति लेनी पड़ती है।इसके लिए कम से कम एक महीने पहले प्रस्ताव लाया जाना चाहिए। जबकि राज्य सरकार ने एक दिन के अंदर इसे विधानसभा में पेश कर पारित भी करा लिया। गत 22 नवम्बर को राज्य सरकार ने विधानसभा में कोलकाता म्युनिसिपल कारपोरेशन (सेकंड अमेंडमेंट) बिल 2018 पेश कर ध्वनिमत से पास करवाया था। इसे अनुमोदन के लिए राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी के पास भेज दिया गया था। गत बुधवार को राज्यपाल ने इस पर अनुमोदन भी दे दिया। इसके बाद माकपा की ओर से कलकत्ता उच्च न्यायालय में इसके खिलाफ याचिका लगाई गई थी। जिस दिन बिल पास हुआ था उसी दिन माकपा विधायक और राज्य के पूर्व मंत्री अशोक भट्टाचार्य ने कहा था कि यह कानून असंवैधानिक है और इसके खिलाफ कोर्ट में याचिका लगाई जाएगी। उन्होंने कहा था कि कायदे से कोलकाता नगर निगम में मेयर नियुक्ति से संबंधित कानून में संशोधन के लिए 72 घंटे पहले संशोधित कानून की प्रति विधायकों को देनी पड़ती है। विस्तार से चर्चा होती है। इसके बाद कानून पारित किया जाता है। राज्य सरकार ने केवल 30 मिनट पहले विधायकों को इसकी जानकारी दी और दो घंटे के अंदर इसे पारित करा दिया। यह अपने आप में न्याय सम्मत नही है।
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