प्रेम रावत आज किसी परिचय के मोहताज नही हैं। शांति के इस अग्रदूत विश्व भर में जाने जाते हैं। युवा वर्ग में शांति की संस्कृति का निर्माण करने का लक्ष्य व विश्व में लोगों में शांति जगाने निकले अंतरराष्ट्रीय शांति दूत प्रेम रावत ने महज तीन साल की उम्र से ही प्रवचन शुरू कर दिया था।प्रख्यात अध्यात्मिक गुरु हंसजी महाराज इनके पिता थे। प्रेम रावत का जन्म 10 दिसंबर 1957 को हरिद्वार में हुआ था। आज के समय में दुनिया भर में इनके हजारों अनुयायी हैं।अपने पिता श्रीहंसजी महाराज के लिए आयोजित कार्यक्रमों में प्रेम ने तीन साल की उम्र से ही प्रवचन शुरू कर दिया था। सम्पादक

‘‘जरूरत’’ एक ऐसा शब्द है जिससे हर कोई परिचित है। बिना जरूरत – बिना आवश्यकता जीवन का एक दिन भी निर्वहन नहीं हो सकता इसलिए कहा जाता है कि ‘‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है।‘‘ जब मनुष्य को जरूरत महसूस हुई, तभी उसने उन सब चीजों को खोजा, जिससे उसकी वह जरूरत पूरी हो सके।जरूरत के बारे में समझिए कि जरूरत क्या होती है और किसको किसकी जरूरत है ? अपनी जिन्दगी में यह बात समझना बहुत जरूरी है कि किसको किसकी जरूरत है ? पानी को मछली की जरूरत नहीं है बल्कि मछली को पानी की जरूरत है। यह समझना बहुत जरूरी है क्योंकि जब मछुआरा पानी में जाल को डालता है तो जाल निकालने पर भले ही पानी मछली से अलग हो जाए, परंतु तब भी मछली को पानी का मोह इतना सताता है कि वह उसके बिना जान दे देती है। पानी को मछली से कोई प्रेम नहीं है वह निरंतर गतिशील है। उसी प्रकार आप भी इस बात को समझिए कि आपको किसकी जरूरत है। क्या कभी आपने बैठकर यह सोचा है कि आपकी असली जरूरत क्या है ? जरूरतों को पूरा करने की व्यवस्था में लग गये पर यह कभी नहीं सोचा कि मेरा जीवन है, मैं जिंदा हूँ। मेरे अंदर स्वांस आता है और जाता है। एक सीमित समय है, जब तक मैं जीवित रहूंगा। इसके बाद मैं यहां नहीं रहूंगा। हमें नहीं मालूम कि वह समय कब आएगा, पर इतना जरूर मालूम है कि आएगा। जब तक हम जीवित हैं, हमारी असली जरूरत क्या है ? हमारा हृदय क्या मांग रहा है ?
हमारा हृदय किस बात को अपनी जरूरत मानता है ? अपने जीवन में कम से कम जो हम यहां आये हैं तो अपनी असली जरूरत को तो पूरा करके जायें। अरे! सारी जरूरतें कभी पूरी नहीं होंगी। मनुष्य चाहे कितना भी परिश्रम कर लें, वह अपनी सारी जरूरतों को पूरा नहीं कर पाएगा। तो कम से कम एक मुख्य जरूरत तो जरूर होगी, जिसको वह पूरा कर सकता है। मनुष्य की कुछ ऐसी जरूरतें होती हैं जो किसी चीज की पाबंदी नहीं मानती है। जिनको अगर मनुष्य रोकना भी चाहे तो उन्हें रोक नहीं सकता है। उसका संबंध इस बात से नहीं है कि मनुष्य पढ़ा-लिखा है या अनपढ़। ‘‘शांति की जरूरत भी ऐसी ही जरूरत है, वह अंदर की जो पुकार है वह कभी किसी की परवाह नहीं करती। चाहे कोई भी हो, पर उसके अंदर की आवाज आती रहती है। परंतु मनुष्य उसको अनसुना करने की कोशिश करता है। प्रेम रावत कहते हैं कि जिस चीज की आपको जरूरत है वह तो आपके ही अंदर है मैं चाहता हूँ कि आप अपनी जिंदगी के अंदर उस जरूरत को स्वयं समझें और उसका अनुभव करें। जब तक हमको इस संसार के अंदर रहते हुए उस शांति का खुद अनुभव नहीं होगा तब तक हम समझ नहीं पाऐंगे कि हमको क्या मिला है, इसलिए उस बनाने वाले ने मनुष्य के अंदर उस शांति की प्यास डाली है। लोग समझते हैं कि अगर दो व्यक्ति लड़ रहे हैं और लड़ना बंद कर दें तो शांति हो जाएगी। यह शांति नहीं है। शांति वह असली जरूरत है जिसको जान लेने के बाद आपके जीवन में आनंद ही आनंद हो जाएगा। क्या आपने अपने जीवन में उस शांति का अनुभव किया है या नहीं ? अगर आपने उस शान्ति का अनुभव नहीं किया है तो कीजिए और अपने जीवन को सफल बनाइए। पे्रमरावत जी मानवता एवं शांति के विषय पर चर्चा करने वाले अन्तर्राष्ट्रीय वक्ता हैं। शान्ति को पाने की प्रेरणा देने के लिए विश्वभर में कई सरकारी और शिक्षण संस्थानों द्वारा उन्हें शांतिदूत की उपाधि प्रदान की गई है। हाल ही में मलेशिया में ‘‘एशिया पैसिफिक ब्रांन्ड फाउन्डेशन’’ ने ‘‘लाइफ टाइम अचीवमेन्ट’’ से उन्हें नवाजा है।

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